बालाघाट के आदिवासी गांवों की कहानी अब बदल रही है। 40 साल तक नक्सलवाद के खौफ में जीने वाले लोग अब डॉक्टरों, दवाइयों और नई सड़कों का स्वागत कर रहे हैं।
यह कहानी मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के उन सुदूर जंगलों और गांवों की है, जहां 40 सालों तक सिर्फ खौफ का सन्नाटा पसरा रहता था। नक्सलवाद ने आम आदिवासियों की जिंदगी को बुरी तरह जकड़ रखा था। जिनका बंदूक से कोई लेना-देना नहीं था, वे भी स्कूल, पक्की सड़क और अस्पताल जैसी छोटी-छोटी चीजों के लिए तरसते रहे। सरकारी टीमें आती थीं, तो लोग डर के मारे छिप जाते थे। लेकिन अब समय का पहिया घूम चुका है और इस कहानी में एक नया सवेरा हो रहा है।
कहानी में बड़ा बदलाव तब आया जब सुरक्षाबलों की मेहनत रंग लाई और पीएम मोदी व अमित शाह की नीतियों से नक्सलवाद कमजोर पड़ा। इसके बाद जब मुख्यमंत्री मोहन यादव खुद इन गांवों में पहुंचे, तो लोगों की आंखों में एक नई चमक आ गई। जो ग्रामीण कभी अफसरों से दूर भागते थे, वे आज 20 सर्वे टीमों, 4 मोबाइल मेडिकल यूनिट (MMU), 10 चिकित्सा अधिकारी और 4 एंबुलेंस का अपने गांवों में खुलकर स्वागत कर रहे हैं।
एक वक्त था जब बीमारी का पता ही नहीं चलता था और लोग दम तोड़ देते थे। लेकिन आज स्वास्थ्यकर्मी 10 गांवों के करीब 980 घरों की दहलीज लांघकर लोगों का हालचाल पूछ रहे हैं। इस दौरान 630 ऐसे लोग मिले जो बीमार थे। इनमें से 461 लोगों को तो घर बैठे ही दवा देकर ठीक कर दिया गया। जिनकी हालत थोड़ी ज्यादा खराब थी, ऐसे 125 मरीजों को एंबुलेंस में बैठाकर अस्पताल ले जाया गया।
इस कहानी का सबसे सुखद हिस्सा वो बच्चे हैं, जो कुपोषण का शिकार हो रहे थे। पिछले एक महीने में 169 बीमार बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जिनमें से 125 बच्चे हंसते-खेलते घर वापस आ चुके हैं। डॉक्टरों ने 597 बच्चों को आयरन का सिरप पिलाया, 521 को अल्बेंडाजोल की गोली दी और 63 बच्चों को खसरे (मीजल्स) का टीका लगाया। साथ ही विटामिन-ए, डफर और जिंक भी दिया गया। अब हर ग्रामीण का पक्का मेडिकल रिकॉर्ड फाइलों में दर्ज हो रहा है।
आज इस इलाके को भोपाल या इंदौर की नजर से मत देखिए। बस यह सोचिए कि जहां 40 साल पहले नक्सलियों के कैंप लगते थे, वहां आज 100 से ज्यादा गांवों की तकदीर बदलने के लिए 200 करोड़ रुपये का फंड आ चुका है। वहां जनसुविधा केंद्र खुल गए हैं। कच्ची पगडंडियों की जगह जो सड़कें बन रही हैं, वे सिर्फ रास्ते नहीं हैं, बल्कि उम्मीद की वो किरण हैं जो एंबुलेंस और प्रशासन को सीधे इन गरीबों के दरवाजे तक ला रही हैं।




