क्या रिजल्ट के बाद बढ़ सकते हैं शिक्षक भर्ती के पद? शिक्षा विभाग के इनकार, 70 हजार अतिथि शिक्षकों और बैकलॉग पदों का इनसाइड एनालिसिस।

मध्य प्रदेश में शिक्षक भर्ती परीक्षा के पदों में वृद्धि की मांग को लेकर भोपाल में चल रहे आंदोलन का यदि विधिक और प्रशासनिक विश्लेषण किया जाए, तो स्थिति नियमों और मांगों के बीच उलझी नजर आती है। प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों को झटका देते हुए शिक्षा विभाग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सेवा भर्ती नियमों के तहत परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद विज्ञापित पदों की संख्या में कोई फेरबदल नहीं किया जा सकता। प्रशासनिक प्रोटोकॉल के अनुसार जो पद रिक्त बचेंगे, उन्हें नई भर्ती चक्र में ही विज्ञापित किया जा सकता है, पिछली भर्ती में जोड़ना नियमों के विरुद्ध है।
पड़ताल के अनुसार, विवाद की जड़ में आरक्षित श्रेणियों के खाली पद हैं। शिक्षा विभाग के स्पष्टीकरण से साफ होता है कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के न्यूनतम अर्हता प्राप्त अभ्यर्थी न मिलने के कारण ये पद बैकलॉग में चले गए हैं। संविधान और भर्ती नियमों के तहत इन आरक्षित पदों को अनारक्षित या ओबीसी वर्ग में परिवर्तित (डिरिजर्व) नहीं किया जा सकता। विभाग ने आंदोलनकारियों के उस नैरेटिव को भी आंकड़ों के साथ खारिज किया जिसमें कहा जा रहा था कि सरकार भर्ती नहीं कर रही है, साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि प्रदर्शनकारी मेरिट में चयनित अभ्यर्थी नहीं हैं।
स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह के रुख का विश्लेषण करें तो यह साफ होता है कि सरकार बजट और आरक्षण रोस्टर के संतुलन पर काम कर रही है। मंत्री ने पहले ही कहा था कि प्रदेश में कार्यरत 70 हजार अतिथि शिक्षकों के पदों को सीधे नियमित रिक्तियां नहीं माना जा सकता और न ही सभी पदों को एक साथ भरना संभव है। चयन प्रक्रिया में ओबीसी आरक्षण विवाद और बैकलॉग के कानूनी पेंच हैं। हालांकि, उन्होंने संकेत दिया था कि मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार चरणबद्ध भर्ती की नीति पर ही आगे बढ़ा जाएगा।
भोपाल में जारी धरने के ग्राउंड एनालिसिस से पता चलता है कि आंदोलन अब गंभीर मानवीय और राजनीतिक संकट का रूप ले चुका है। तीन अभ्यर्थी भूख हड़ताल पर हैं जिनका स्वास्थ्य लगातार गिर रहा है। अभ्यर्थियों का कहना है कि सामाजिक और पारिवारिक दबाव के चलते वे आंदोलन के लिए मजबूर हुए हैं। दूसरी तरफ, विपक्ष ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार का इस आंदोलन के पक्ष में खुलकर आना और मांगों को शत-प्रतिशत जायज ठहराना यह दर्शाता है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक सिरदर्द बन सकता है।




