मध्य प्रदेश में टीईटी अनिवार्यता को लेकर उपजे विवाद का इनसाइड विश्लेषण। जानिए सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों, 1.50 लाख शिक्षकों की सेवा शर्तों और नेता प्रतिपक्ष द्वारा सुझाए गए तमिलनाडु मॉडल का पूरा गणित।
मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग में शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता को लेकर उपजे गतिरोध का यदि प्रशासनिक और कानूनी विश्लेषण किया जाए, तो यह डेढ़ लाख कर्मचारियों से जुड़ा बड़ा नीतिगत मामला बन चुका है। इसी पेचीदगी को देखते हुए विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की औपचारिक मांग की है, ताकि विधायी स्तर पर इस संकट का कानूनी समाधान निकाला जा सके।
दस्तावेजों के अनुसार, सिंघार ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री से स्पष्ट आग्रह किया है कि शिक्षकों के हितों को नीतिगत प्राथमिकता दी जाए। उनका तर्क है कि जब तक विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर टीईटी से संबंधित नीतिगत बाधाओं पर व्यापक विमर्श नहीं होगा, तब तक प्रदेश के लगभग 1.50 लाख प्रभावित शिक्षकों एवं उनके परिवारों के भविष्य की सुरक्षा के लिए ठोस कानूनी प्रावधान नहीं बनाए जा सकते।
विश्लेषण बताता है कि वर्षों पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर टीईटी की अनिवार्यता लागू करने से उनकी सेवा-निरंतरता, वरिष्ठता, क्रमोन्नति और पदोन्नति के लाभ सीधे प्रभावित हो रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष के पत्र के मुताबिक, इस एक नीतिगत अड़चन से प्रदेश के करीब 1.50 लाख शिक्षक और उनके परिवार सीधे तौर पर प्रशासनिक व वित्तीय अनिश्चितता के दौर में पहुंच गए हैं।
कानूनी पड़ताल में सामने आता है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 1 सितंबर 2025 और 29 मई 2026 के निर्णयों के बाद पूरे देश में टीईटी का विषय कानूनी रूप से बेहद संवेदनशील हो चुका है। उमंग सिंघार का कहना है कि इन अदालती आदेशों के परिप्रेक्ष्य में राज्य सरकार को अपने अधिकार क्षेत्र का उपयोग करते हुए शिक्षकों के भविष्य की रक्षा के लिए तत्काल गंभीर नीतिगत रुख अपनाना चाहिए।
रिपोर्ट का सबसे अहम पहलू तमिलनाडु विधानसभा द्वारा 25 अगस्त 2026 को पारित किया गया प्रस्ताव है। तमिलनाडु ने 23 अगस्त 2010 से पूर्व नियुक्त सभी शिक्षकों को टीईटी अनिवार्यता से छूट देकर उनके सेवा व पदोन्नति हितों को संरक्षित किया है। सिंघार का विश्लेषण है कि जब संविधान के तहत अन्य राज्य अपने शिक्षकों के लिए विधानसभा से प्रस्ताव ला सकते हैं, तो मध्य प्रदेश सरकार को भी इसी मॉडल पर शिक्षकों के लिए स्थायी व न्यायसंगत समाधान निकालना चाहिए।




