इसरो के GSLV-F17 रॉकेट द्वारा EOS-05 को कक्षा में स्थापित करने का तथ्यात्मक विश्लेषण। जानिए कैसे 1990 के दशक की स्वदेशी क्रायोजेनिक तकनीक ने 2021 की विफलता को शानदार जीत में बदल दिया।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की लॉन्चिंग प्रक्रिया का यदि हम तकनीकी विश्लेषण करें, तो GSLV-F17 का मिशन 100% एक्यूरेसी वाला रहा। 4 सितंबर को सुबह 2:55 बजे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से उड़ान भरने के बाद रॉकेट ने सिर्फ 19 मिनट की विंडो में 2,376 किलोग्राम वजनी EOS-05 पृथ्वी अवलोकन उपग्रह को सफलतापूर्वक भू-तुल्यकालिक कक्षा में स्थापित कर दिया।
यह जानना बेहद दिलचस्प है कि GSLV Mk-II को इसरो के भीतर 'नॉटी बॉय' क्यों कहा जाता था। दरअसल, इसकी डिजाइन और थ्रस्ट मैकेनिज्म में पुरानी विफलताओं के कारण संगठन पर हमेशा दबाव रहता था। लेकिन ताजा मिशन के टेलीमेट्री डेटा से पता चलता है कि इस बार 'नॉटी बॉय' ने अपनी प्रक्षेपवक्र (Trajectory) में कोई विचलन नहीं दिखाया और उम्मीदों पर पूरी तरह खरा उतरा।
करीब 2,376 किलोग्राम भारी EOS-05 को 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित करने के पीछे एक बड़ा वैज्ञानिक कारण है। इस भू-तुल्यकालिक कक्षा से यह सैटेलाइट धरती के एक बड़े हिस्से को लगातार कवर करेगा। इसका मुख्य फोकस चक्रवात, बाढ़, जंगल की आग और जलवायु परिवर्तन से जुड़े डेटा का रियल-टाइम एनालिसिस करना है।
अगर हम EOS-05 के सेंसर्स की पड़ताल करें, तो इसमें बेहद उन्नत इमेजिंग सिस्टम लगा है। यह दृश्य इन्फ्रारेड, मल्टी-स्पेक्ट्रल और हाइपर-स्पेक्ट्रल बैंड्स पर काम करता है। इन चार अलग-अलग स्पेक्ट्रम्स से मिलने वाला डेटा मौसम वैज्ञानिकों को प्राकृतिक आपदाओं की माइक्रो-लेवल और सबसे सटीक जानकारी प्रोसेस करने में मदद करेगा।
इस मिशन की सफलता का कोर इंजन हमारी स्वदेशी क्रायोजेनिक तकनीक है। 1990 के दशक की जिओपॉलिटिक्स को देखें, तो पश्चिमी देशों ने भारत को यह तकनीक देने से इनकार कर दिया था। उस क्राइसिस के बाद इसरो के वैज्ञानिकों ने स्क्रैच से काम शुरू किया और आज उसी स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन ने इस भारी-भरकम रॉकेट को सफल उड़ान दी है।
अगस्त 2021 में GSLV-F10 मिशन के तहत EOS-03 को कक्षा में स्थापित करने का प्रयास विफल हुआ था। उस वक्त क्रायोजेनिक अपर स्टेज में इग्निशन की समस्या आई थी। हमारी रिपोर्ट बताती है कि इसरो ने उस चुनौती का डीप फॉल्ट-एनालिसिस किया और खामियों को दूर किया। इसी सीख का परिणाम है कि आज EOS-05 मिशन एक अहम और सफल वापसी साबित हुआ है।




